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Devi Kavach (Durga Kavach): Lyrics, Meaning

By Choghadiya Now · Published 22 September 2026

Devi Kavach, also called Durga Kavach or Chandi Kavach, is a 56-verse prayer of protection read before the Durga Saptashati. In it Brahma tells the sage Markandeya which form of the Goddess guards each direction and each part of the body. The full Sanskrit text is below, with the Hindi meaning of every verse one tap away.

Video: “Durga Kavach - with Sanskrit lyrics //Brijesh Jha”, from Divine Qualities on YouTube.
॥ अथ देव्याः कवचम् ॥
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता,
अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ॥
इस श्री चण्डी कवच के ऋषि ब्रह्मा हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता चामुण्डा हैं। अंगन्यास में कही गई माताएँ इसका बीज हैं और दिग्बन्ध के देवता इसका तत्त्व हैं। श्री जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए, सप्तशती पाठ के अंग के रूप में, इसके जप का विनियोग किया जाता है।
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥
ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।
मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
मार्कण्डेय जी ने कहा: हे पितामह! संसार में जो परम गोपनीय है, जो मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करता है और जिसे आपने अब तक किसी को नहीं बताया, वह मुझे बताइए।
ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥ २ ॥
ब्रह्मा जी बोले: हे विप्र! ऐसा परम गोपनीय और सब प्राणियों का उपकार करने वाला साधन है, देवी का पवित्र कवच। हे महामुने! उसे सुनो।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ ३ ॥
देवी का पहला रूप शैलपुत्री, दूसरा ब्रह्मचारिणी, तीसरा चन्द्रघण्टा और चौथा कूष्माण्डा है।
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥ ४ ॥
पाँचवाँ रूप स्कन्दमाता, छठा कात्यायनी, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ महागौरी है।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥ ५ ॥
नौवाँ रूप सिद्धिदात्री है। ये नवदुर्गा कहलाती हैं। ये नाम स्वयं महात्मा ब्रह्मा जी ने बताए हैं।
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्त्ताः शरणं गताः ॥ ६ ॥
जो मनुष्य आग में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, या किसी विषम और दुर्गम संकट में पड़ा हो, और भय से व्याकुल होकर भगवती की शरण में आया हो,
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे ।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥ ७ ॥
उसका युद्ध या संकट में कोई अमंगल नहीं होता। मैं उस पर कोई विपत्ति आती नहीं देखता, और उसे शोक, दुःख और भय नहीं घेरते।
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते ।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ॥ ८ ॥
जिन्होंने भक्ति से देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही उत्थान होता है। हे देवेश्वरी! जो तुम्हारा स्मरण करते हैं, उनकी तुम रक्षा करती हो, इसमें कोई संदेह नहीं।
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ॥ ९ ॥
चामुण्डा प्रेत (शव) पर आरूढ़ हैं, वाराही भैंसे पर बैठी हैं, ऐन्द्री हाथी पर सवार हैं और वैष्णवी गरुड़ पर विराजमान हैं।
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना ।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ॥ १० ॥
माहेश्वरी बैल पर और कौमारी मोर पर सवार हैं। भगवान विष्णु की प्रिया लक्ष्मी देवी कमल पर विराजमान हैं और उनके हाथ में कमल है।
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना ।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥ ११ ॥
श्वेत रूप धारण करने वाली ईश्वरी देवी बैल पर सवार हैं। ब्राह्मी हंस पर बैठी हैं और सब प्रकार के आभूषणों से सजी हैं।
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः ।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥ १२ ॥
ये सभी माताएँ सब प्रकार की योगशक्तियों से युक्त हैं, और अनेक आभूषणों तथा रत्नों से शोभित हैं।
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥ १३ ॥
ये सब देवियाँ क्रोध से भरी हुई रथों पर बैठी दिखाई देती हैं। वे शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल धारण करती हैं,
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥ १४ ॥
और ढाल, तोमर, फरसा, पाश, भाला, त्रिशूल और उत्तम शार्ङ्ग धनुष भी।
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥ १५ ॥
ये आयुध वे दैत्यों के शरीर का नाश करने, भक्तों को अभय देने और देवताओं के हित के लिए धारण करती हैं।
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥ १६ ॥
हे महारौद्रे! हे अत्यन्त भयंकर पराक्रम वाली, महाबलशाली, महान उत्साह वाली और बड़े से बड़े भय का नाश करने वाली देवी! तुम्हें नमस्कार है।
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्द्धिनि ।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ॥ १७ ॥
हे देवी! तुम्हारी ओर देख पाना भी कठिन है, और तुम शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली हो। मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऐन्द्री और अग्निकोण में अग्निदेवता मेरी रक्षा करें।
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी ।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद्वायव्यां मृगवाहिनी ॥ १८ ॥
दक्षिण में वाराही, नैर्ऋत्य कोण में खड्गधारिणी, पश्चिम में वारुणी और वायव्य कोण में मृग पर सवार मृगवाहिनी रक्षा करें।
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी ।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा ॥ १९ ॥
उत्तर में कौमारी और ईशान कोण में शूलधारिणी रक्षा करें। ऊपर ब्रह्माणी और नीचे वैष्णवी मेरी रक्षा करें।
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना ।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ॥ २० ॥
इसी प्रकार शव पर सवार चामुण्डा दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें। जया आगे से और विजया पीछे से मेरी रक्षा करें।
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता ।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ॥ २१ ॥
बाईं ओर अजिता और दाहिनी ओर अपराजिता रक्षा करें। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करें और उमा मस्तक पर स्थित होकर रक्षा करें।
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्यशस्विनी ।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ॥ २२ ॥
ललाट में मालाधरी और दोनों भौंहों की यशस्विनी रक्षा करें। भौंहों के बीच त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टा रक्षा करें।
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी ॥ २३ ॥
दोनों नेत्रों के बीच शंखिनी और दोनों कानों की द्वारवासिनी रक्षा करें। गालों की कालिका और कानों की जड़ की शांकरी रक्षा करें।
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥ २४ ॥
नासिका में सुगन्धा और ऊपर के होंठ की चर्चिका रक्षा करें। नीचे के होंठ की अमृतकला और जीभ की सरस्वती रक्षा करें।
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका ।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥ २५ ॥
दाँतों की कौमारी और कण्ठ की चण्डिका रक्षा करें। गले की घाँटी की चित्रघण्टा और तालु की महामाया रक्षा करें।
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्वाचं मे सर्वमङ्गला ।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ॥ २६ ॥
ठोड़ी की कामाक्षी और मेरी वाणी की सर्वमंगला रक्षा करें। गर्दन की भद्रकाली और रीढ़ की धनुर्धरी रक्षा करें।
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद्बाहू मे वज्रधारिणी ॥ २७ ॥
कण्ठ के बाहरी भाग की नीलग्रीवा और कण्ठ की नली की नलकूबरी रक्षा करें। दोनों कंधों की खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करें।
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च ।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ॥ २८ ॥
दोनों हाथों की दण्डिनी और उँगलियों की अम्बिका रक्षा करें। नखों की शूलेश्वरी और कोख की कुलेश्वरी रक्षा करें।
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी ।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ॥ २९ ॥
मन के शोक को मिटाने वाली महादेवी दोनों स्तनों की रक्षा करें। हृदय में ललिता देवी और उदर में शूलधारिणी रक्षा करें।
नाभौ च कामिनी रक्षेद्गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥ ३० ॥
नाभि की कामिनी और गुप्त अंग की गुह्येश्वरी रक्षा करें। पूतना और कामिका लिंग की, और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें।
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥ ३१ ॥
कमर की भगवती और घुटनों की विन्ध्यवासिनी रक्षा करें। सब कामनाएँ पूरी करने वाली महाबला दोनों पिंडलियों की रक्षा करें।
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी ।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ॥ ३२ ॥
टखनों की नारसिंही और पैरों के ऊपरी भाग की तैजसी रक्षा करें। पैरों की उँगलियों की श्रीदेवी और तलवों की तलवासिनी रक्षा करें।
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी ।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ॥ ३३ ॥
नखों की दंष्ट्राकराली और केशों की ऊर्ध्वकेशिनी रक्षा करें। रोमकूपों की कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरी रक्षा करें।
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ॥ ३४ ॥
रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की पार्वती रक्षा करें। आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करें।
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु ॥ ३५ ॥
पद्मकोश की पद्मावती और कफ की चूडामणि रक्षा करें। नखों के तेज की ज्वालामुखी और शरीर के सब जोड़ों की अभेद्या रक्षा करें।
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ॥ ३६ ॥
मेरे वीर्य की ब्रह्माणी और छाया की छत्रेश्वरी रक्षा करें। मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की धर्मधारिणी रक्षा करें।
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ॥ ३७ ॥
प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की वज्रहस्ता रक्षा करें, और मेरे प्राणों की कल्याणशोभना रक्षा करें।
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ॥ ३८ ॥
रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श में योगिनी रक्षा करें, और सत्त्व, रज, तम तीनों गुणों की नारायणी सदा रक्षा करें।
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ॥ ३९ ॥
आयु की वाराही और धर्म की वैष्णवी रक्षा करें। यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन और विद्या की चक्रिणी रक्षा करें।
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ॥ ४० ॥
मेरे गोत्र की इन्द्राणी रक्षा करें। हे चण्डिके! मेरे पशुओं की रक्षा करो। पुत्रों की महालक्ष्मी और पत्नी की भैरवी रक्षा करें।
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा ।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ॥ ४१ ॥
रास्ते की सुपथा और यात्रा के मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करें। राजद्वार में महालक्ष्मी रक्षा करें, और विजया सब ओर से रक्षा के लिए स्थित रहें।
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ॥ ४२ ॥
हे देवी! जो स्थान कवच में नहीं गिना गया और रक्षा से छूट गया हो, हे पाप का नाश करने वाली जयन्ती! तुम उस सबकी रक्षा करो।
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ॥ ४३ ॥
जो अपना कल्याण चाहता है, वह कवच के बिना एक पग भी न चले। कवच से सदा घिरा हुआ मनुष्य जहाँ-जहाँ जाता है,
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः ।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥ ४४ ॥
वहाँ-वहाँ उसे धन का लाभ होता है और सब कामनाएँ पूरी करने वाली विजय मिलती है। वह जिस-जिस कामना का चिन्तन करता है, उसे निश्चय ही पाता है, और इस धरती पर अतुलनीय परम ऐश्वर्य प्राप्त करता है।
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः ।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ॥ ४५ ॥
कवच से घिरा हुआ मनुष्य निर्भय हो जाता है, युद्धों में कभी हारता नहीं और तीनों लोकों में पूजनीय होता है।
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ॥ ४६ ॥
देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो मनुष्य संयमित मन से और श्रद्धा के साथ प्रतिदिन तीनों संध्याओं में इसका पाठ करता है,
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः ।
जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ॥ ४७ ॥
उसे दैवी कला (दिव्य शक्ति) प्राप्त होती है, वह तीनों लोकों में अजेय रहता है, और अकाल मृत्यु से बचकर सौ से अधिक वर्ष जीता है।
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ॥ ४८ ॥
मकड़ी के विष और फोड़े-फुंसी जैसे सब रोग नष्ट हो जाते हैं। स्थावर, जंगम और कृत्रिम, हर प्रकार का विष भी उतर जाता है।
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चौपदेशिकाः ॥ ४९ ॥
धरती पर किए जाने वाले सब अभिचार प्रयोग और मन्त्र-यन्त्र, धरती, आकाश और जल में रहने वाले उपद्रवी जीव, और दूसरों के बताए प्रयोग से भेजे गए उपद्रव,
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा ।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ॥ ५० ॥
जन्म से और कुल-परम्परा से आए रोग, माला (गण्डमाला), डाकिनी, शाकिनी, और आकाश में घूमने वाली भयंकर और बलवान डाकिनियाँ,
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥ ५१ ॥
ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि,
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।
मानोन्नतिर्भवेद्राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ॥ ५२ ॥
हृदय में कवच धारण करने वाले उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। राजा से उसे मान मिलता है, और यह कवच उसके तेज को बहुत बढ़ाता है।
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले ।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ॥ ५३ ॥
वह यश से बढ़ता है और धरती पर उसकी कीर्ति फैलती है। पहले कवच का पाठ करके फिर सप्तशती चण्डी का जप करना चाहिए।
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी ॥ ५४ ॥
जब तक पर्वतों, वनों और काननों सहित यह पृथ्वी टिकी है, तब तक धरती पर उसकी पुत्र-पौत्रों वाली वंश-परम्परा बनी रहती है।
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ॥ ५५ ॥
देह छूटने पर वह मनुष्य महामाया की कृपा से उस परम स्थान को पाता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है,
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ ॐ ॥ ५६ ॥
वह परम रूप प्राप्त करता है और भगवान शिव के साथ आनन्द करता है।
॥ इति श्रीवाराहपुराणे हरिहरब्रह्मविरचितं देव्याः कवचं सम्पूर्णम् ॥
इस प्रकार श्री वाराहपुराण में हरि, हर और ब्रह्मा द्वारा रचा गया देवी कवच पूरा हुआ।

When should Devi Kavach be recited?

The kavach answers this itself. Verse 46 says it is read trisandhyam, at the three junctions of the day: dawn, midday and dusk. The same verse asks for two things of the reader, a composed mind and faith.

For dawn, the window before sunrise is Brahma Muhurta. It is the fourteenth of the night’s fifteen muhurtas, so its clock time moves with your city’s sunrise through the year. For midday, Abhijit Muhurat is the window at the exact centre of daylight. Dusk is the time around sunset. Both pages compute the times for your own city, not for a fixed clock.

Why is Devi Kavach read before the Durga Saptashati?

Verse 53 sets the order: japet saptashatim chandim kritva tu kavacham pura, “recite the Saptashati Chandi, having first recited the kavach.” That is why the kavach is printed at the front of the Durga Saptashati, ahead of its thirteen chapters of the Devi Mahatmya.

Many readers take up the full Saptashati during Navratri, and the kavach comes first on each of those nine days too. Sharad Navratri 2026 begins on Sunday 11 October. The 2026 festival dates post lists it with Maha Ashtami, Dussehra and the rest of the year.

Devi Kavach: frequently asked questions

Are Devi Kavach, Durga Kavach and Chandi Kavach the same?
Yes, they are three names for one text. Its opening viniyoga calls it the Shri Chandi Kavach, its closing line calls it the Devi Kavach, and Durga Kavach is the everyday name, after the nine Durgas it names in verses 3 to 5. Some books spell it Kavacham or Kawach; the verses are the same.
Where does Devi Kavach come from?
Its own closing line names the source: iti shri varaha purane harihara brahma virachitam devyah kavacham sampurnam, "thus ends the Devi Kavach, composed by Hari, Hara and Brahma, in the Varaha Purana." It is often called a part of the Markandeya Purana. That is true of the Saptashati it is read with, whose seven hundred verses are the Devi Mahatmya, but not of the kavach itself. Markandeya does appear inside it: in verse 1 the sage asks Brahma for the most secret protection there is, and Brahma answers with the kavach.
How many verses are in Devi Kavach?
There are 56 numbered verses, plus the viniyoga at the start and the closing line. Most have two lines, and verse 44 has three. Verses 3 to 5 name the nine Durgas, verses 9 to 15 the Mothers riding out armed, and verses 16 to 20 the ten directions. Verses 21 to 42 go through the body from the crown of the head to the soles of the feet, then to the breath, the mind, the family and the road. Verses 43 to 56 are the phalashruti, what the reading brings.
Do I need to know Sanskrit to recite Devi Kavach?
No. You can read slowly from the Devanagari text, or recite along with the video at the top of the page until the rhythm is familiar. Tap "With meaning" above the text to see the Hindi meaning under every verse. The kavach asks only for a composed mind and faith (verse 46). If your family or tradition has its own rule about who recites it, or how, your family priest is the person to ask.
How was the text on this page checked?
Every line was compared on 22 September 2026 with two independently proofread editions of the text published on sanskritdocuments.org. Where they differ only in spelling, this page uses the standard form. If a line here differs from the book your family reads from, please tell us which edition it is, and we will check it.

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