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घर का मंदिर (Pooja Room Vastu): दिशा, रंग और क्या न रखें

वास्तु के अनुसार घर का मंदिर (पूजा घर) उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में सबसे अच्छा माना जाता है; यह न हो सके तो पूर्व या उत्तर दिशा। पूजा करते समय आपका मुंह पूर्व या उत्तर की ओर रहे। मंदिर बाथरूम की दीवार से सटा न हो, सीढ़ी के नीचे न हो, और उसमें खंडित मूर्ति, फटी तस्वीर या पितरों की फोटो न रखी जाए।

ज्यादातर शहरी घरों में पूजा के लिए अलग कमरा नहीं होता। मंदिर कभी लिविंग रूम के कोने में होता है, कभी रसोई के एक खाने में, और कभी दीवार पर टंगा लकड़ी का छोटा मंदिर। इस लेख में यही असली हालात हैं: नियम क्या है, और जगह न हो तो क्या किया जा सकता है।

वास्तु के अनुसार घर का मंदिर या पूजा रूम किस दिशा में हो?

ईशान कोण को वास्तु में देव स्थान कहा जाता है। सुबह की पहली धूप यहीं से आती है, और इस कोने को जल तत्व से जोड़ा जाता है। इसलिए घर के मंदिर के लिए इसे पहली पसंद माना जाता है। इस कोने के बाकी नियम हमारे ईशान कोण और दक्षिण दिशा वाले लेख में हैं।

ईशान कोण में जगह न हो, तो पूर्व या उत्तर की दीवार अगला विकल्प है। पश्चिम को कुछ जानकार चल जाने वाला मानते हैं। दक्षिण दिशा में मंदिर रखने से लगभग सभी वास्तु जानकार मना करते हैं।

पूजा करते समय मुंह किधर हो? परंपरा में पूजा करने वाले का मुंह पूर्व या उत्तर की ओर होना अच्छा माना जाता है। इसका मतलब है कि मूर्तियों का मुंह पश्चिम या दक्षिण की ओर होगा। कुछ परिवार मूर्तियों का मुंह पूर्व की ओर रखते हैं, ताकि पूजा करने वाला पश्चिम की ओर देखे। दोनों तरीके अलग-अलग घरों में चलते हैं।

मंदिर कहाँ न हो:

  • बाथरूम या शौचालय की दीवार से सटा हुआ, या उसके ठीक ऊपर-नीचे
  • सीढ़ी के नीचे
  • बेडरूम में, खासकर बेड के सामने। जगह न हो तो रात में मंदिर पर परदा डाल दें
  • तहखाने में

मंदिर की ऊंचाई और मूर्तियों का आकार कैसा हो?

मंदिर इतनी ऊंचाई पर रखा जाता है कि बैठकर या खड़े होकर पूजा करते समय भगवान के चरण आपकी छाती की ऊंचाई के आसपास हों। बहुत नीचे, फर्श पर सीधे, या इतना ऊंचा कि सिर उठाकर देखना पड़े, दोनों ठीक नहीं माने जाते।

घर के मंदिर में छोटी मूर्तियां रखने की परंपरा है। बड़ी मूर्तियों की रोज विधि से पूजा, स्नान और भोग जरूरी माना जाता है, जो हर घर में संभव नहीं। इसलिए कई परिवार छोटी मूर्तियां या तस्वीरें रखते हैं। मूर्तियां एक-दूसरे के ठीक आमने-सामने न रखें, और दीवार से थोड़ा हटाकर रखें।

घर के मंदिर के लिए कौन सा रंग अच्छा है?

मंदिर का रंग हल्का और शांत रखने की सलाह दी जाती है। सबसे आम पसंद ये हैं:

रंग मान्यता
सफेद या क्रीम शुद्धता, संगमरमर के मंदिर का रंग
हल्का पीला गुरु और ज्ञान से जुड़ा, पूजा का पारंपरिक रंग
हल्का नारंगी या केसरिया भक्ति का रंग
हल्का गुलाबी या आसमानी शांति, खासकर दीवार के लिए
लकड़ी का प्राकृतिक रंग शीशम या सागौन का मंदिर

काला, गहरा नीला और गहरा भूरा रंग मंदिर में आमतौर पर टाला जाता है। लाल रंग पर मत अलग हैं: कुछ इसे देवी पूजा के लिए अच्छा मानते हैं, कुछ इसे मंदिर की पूरी दीवार पर बहुत तेज मानते हैं। चुनरी या आसन लाल हो सकता है।

मंदिर के लिए लकड़ी और संगमरमर सबसे पारंपरिक सामग्री है। आजकल MDF और कांच के मंदिर भी आते हैं; ये भी चलते हैं, बस कांच का मंदिर टूटने पर उसे तुरंत बदल दें।

क्या दीवार पर टंगा मंदिर रखना ठीक है?

हां, वास्तु में दीवार पर लगा मंदिर गलत नहीं माना जाता, और छोटे फ्लैटों में यही सबसे व्यावहारिक तरीका है। बस कुछ बातें देखें:

  1. दीवार की दिशा: उत्तर-पूर्व, पूर्व या उत्तर की दीवार चुनें।
  2. पीछे क्या है: जिस दीवार पर मंदिर लगे, उसके दूसरी तरफ बाथरूम न हो।
  3. मजबूती: दीवार में ठीक से एंकर बोल्ट लगवाएं। मूर्तियों, दीये और घंटी का वजन अच्छा खासा होता है।
  4. दीया: टंगे मंदिर में दीया जलाते समय ऊपर की लकड़ी पर कालिख और आग का ध्यान रखें। दीये के ऊपर कम से कम एक फुट जगह खाली रखें, या दीया नीचे अलग स्टैंड पर रखें।
  5. ऊंचाई: इतनी कि खड़े होकर पूजा करते समय भगवान आपकी आंखों से थोड़ा नीचे हों।

किराए के घर में ड्रिल की अनुमति न हो, तो दीवार की जगह एक छोटी चौकी या लकड़ी का स्टैंड बेहतर है।

घर के मंदिर में क्या नहीं रखना चाहिए?

परंपरा में इन चीजों को मंदिर में न रखने की सलाह दी जाती है:

  • खंडित मूर्ति या फटी तस्वीर: इन्हें सम्मान से बहते पानी में प्रवाहित करें या पीपल के पेड़ के नीचे रख दें।
  • एक ही भगवान की कई मूर्तियां: एक से ज्यादा गणेश जी या दो शिवलिंग एक साथ न रखने की बात कही जाती है। कुछ परिवार तीन गणेश जी को खास तौर पर टालते हैं।
  • पितरों की तस्वीर: पूर्वजों की फोटो मंदिर में भगवान के साथ नहीं रखी जाती। उनके लिए दक्षिण की दीवार अलग मानी जाती है, जिसके बारे में घर में कौन सी तस्वीरें लगाएं में लिखा है।
  • सूखे फूल और बासी माला: रोज या हर दूसरे दिन बदलें।
  • उग्र रूप: कई परिवार घर के मंदिर में भगवान के उग्र रूप, जैसे रौद्र रूप वाली तस्वीरें, नहीं रखते। शनि देव की मूर्ति भी आमतौर पर घर में नहीं रखी जाती; उनकी पूजा मंदिर में की जाती है।
  • एक से ज्यादा शंख: पूजा के लिए एक शंख काफी माना जाता है।
  • फालतू सामान: पुराने कैलेंडर, दवाइयां, चाबियां या कागज मंदिर के खानों में न ठूंसें।

पूजा का सही समय क्या है?

रोज की पूजा के लिए सुबह स्नान के बाद का समय और शाम को सूर्यास्त के आसपास का समय सबसे आम है। जो लोग सुबह जल्दी उठते हैं, वे ब्रह्म मुहूर्त में ध्यान या पाठ करते हैं; यह सूर्योदय से करीब डेढ़ घंटे पहले का समय है और हर शहर में अलग होता है। शाम का दीया सूर्यास्त के समय जलाया जाता है।

अगर आप दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, तो देवी कवच का पूरा पाठ अर्थ के साथ इस साइट पर है।

घर के मंदिर से जुड़े सामान्य सवाल

क्या रसोई में मंदिर रख सकते हैं?

वास्तु में इसे आदर्श नहीं माना जाता, पर छोटे घरों में बहुत से परिवार ऐसा करते हैं। तब मंदिर को चूल्हे से दूर, रसोई के उत्तर-पूर्व हिस्से में रखें। रसोई के बाकी नियम रसोई का वास्तु में हैं।

मंदिर में घंटी और शंख कहाँ रखें?

घंटी मंदिर के दाईं ओर रखी जाती है, और शंख को एक छोटे आसन या कपड़े पर, जल भरकर नहीं, सूखा रखा जाता है। पूजा के बाद शंख का जल घर में छिड़कने की परंपरा भी है।

क्या मंदिर में पैसे रख सकते हैं?

कई परिवार दिवाली पर लक्ष्मी पूजा का सिक्का या नोट मंदिर में रखते हैं, जो साल भर वहीं रहता है। रोज के खर्च वाला पैसा, पर्स या चाबियां मंदिर में नहीं रखी जातीं।

क्या दो मंजिल के घर में मंदिर ऊपर हो सकता है?

हो सकता है। बस मंदिर के ठीक ऊपर या नीचे बाथरूम न हो। कई परिवार भूतल पर ही मंदिर रखना पसंद करते हैं, ताकि बुजुर्गों को सीढ़ी न चढ़नी पड़े।

यह लेख बताता है कि पंचांग की परंपरा किसी समय के बारे में क्या कहती है; यह किसी की निजी सलाह नहीं है। ऊपर के पेजों पर समय आपके चुने हुए शहर के हिसाब से निकलता है।

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